श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.54.17 
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति।
अप्रमत्त: स्थितो दान्त: पृथिवीं परिपालय॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'आपका कल्याण हो, अब मैं कैलाश पर्वत पर जाऊँगा। आप सावधान रहें और अपनी इन्द्रियों को वश में रखें तथा पृथ्वी का ध्यान रखें।'॥17॥
 
'May you be blessed, now I will go to Mount Kailash. You be cautious and control your senses and take care of the earth.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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