श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  2.54.13-14 
स्वप्ने द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम्।
नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम्॥ १३॥
उग्रं रुद्रं पशुपतिं महादेवमुमापतिम्।
हरं शर्वं वृषं शूलं पिनाकिं कृत्तिवाससम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'राजेन्द्र! रात्रि के अंत में तुम्हें स्वप्न में भगवान शंकर दिखाई देंगे जिन्हें नीलकंठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरांतक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूलि, पिनाकी और कृत्तिवासा के नाम से जाना जाता है। 13-14॥
 
'Rajendra! At the end of the night, you will see Lord Shankar in your dream who is known as Neelkanth, Bhava, Sthanu, Kapali, Tripuraantaka, Ugra, Rudra, Pashupati, Mahadev, Umapati, Hara, Sharva, Vrish, Shuli, Pinaki and Krittivasa. 13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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