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mahabharat 2.53.d2: उस यज्ञ मण्डप में स्वर्णिम जटाओं से बने द्वार दिखाई दे रहे थे, जो अपनी प्रभा से तेजस्वी सूर्य के समान चमक रहे थे। वह विशाल यज्ञ मण्डप उन उज्ज्वल द्वारों से मानो ग्रहों से युक्त आकाश प्रकाशित हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 2.53: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.53.d2 
ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च।
दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा।
स यज्ञस्तोरणैस्तैश्च ग्रहैर्द्यौरिव सम्बभौ॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञ मण्डप में स्वर्णिम जटाओं से बने द्वार दिखाई दे रहे थे, जो अपनी प्रभा से तेजस्वी सूर्य के समान चमक रहे थे। वह विशाल यज्ञ मण्डप उन उज्ज्वल द्वारों से मानो ग्रहों से युक्त आकाश प्रकाशित हो रहा था।
 
In that Yajna Mandap, gates made of golden locks were visible, which were shining like the bright sun with their radiance. That huge Yajna Mandap was lit up with those bright gates like the sky with planets.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)