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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 53: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन  »  श्लोक d14
 
 
श्लोक  2.53.d14 
नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यो नाबहुश्रुत:।
नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विज:॥
 
 
अनुवाद
उस यज्ञमंडप में एक भी सदस्य ऐसा नहीं था जो वेदों के छह अंगों का ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रत का पालन करने वाला, गुरु, पापरहित, क्षमाशील और शक्तिशाली न हो।
 
There was not a single member in that Yajnamandap who was not knowledgeable about the six parts of the Vedas, polymath, a devotee of fasting, a teacher, sinless, forgiving and powerful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)