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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 53: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.53.54 
क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम्।
उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
'तथा समस्त क्षत्रिय समूह भी आपकी कृपा से मेरे अधीन हो गया और उत्तम रत्नों का दान लेकर मेरे पास आया।
 
‘And the entire Kshatriya group also became subservient to me by your grace and came to me with gifts of the finest jewels.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)