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mahabharat 2.53.52: 'कुरुनन्दन! मैं आपकी अनुमति चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरी जाऊँगा। सौभाग्यवश आपने सब यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया है।' ॥52॥   |   mahabharat अध्याय 2.53: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.53.52 
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्टॺा त्वं प्राप्तवानसि॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
'कुरुनन्दन! मैं आपकी अनुमति चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरी जाऊँगा। सौभाग्यवश आपने सब यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया है।' ॥52॥
 
'Kurunandan! I seek your permission, now I will go to Dwarkapuri. Fortunately you have performed the best of all yagyas, Rajasuya.' ॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)