श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 53: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  2.53.23-24 
शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया।
अपराधशतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने॥ २३॥
दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवा:।
अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ बैठे हुए सब राजा सुनें कि मैंने अब तक उसके अपराधों को क्यों क्षमा किया है। उसकी माता के अनुरोध पर मैंने उसे यह वरदान दिया था कि मैं शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा करूँगा। हे राजन! वे सब अपराध अब पूरे हो चुके हैं; अतः तुम सब राजाओं के सामने ही मैं अभी उसका वध करूँगा।'॥23-24॥
 
'All the kings sitting here should hear why I have forgiven his crimes till now. On the request of his mother, I had granted him this boon that I will forgive a hundred crimes of Shishupal. O kings! All those crimes have been completed now; therefore, in front of all you kings, I will kill him right now.'॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)