श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन  »  श्लोक 9-11h
 
 
श्लोक  2.51.9-11h 
अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वच:।
यस्योत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ॥ ९॥
पतिष्यत: क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ।
तृतीयमेतद् बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम्॥ १०॥
निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युर्भविष्यति।
 
 
अनुवाद
तब उसी अदृश्य प्रेत ने पुनः उत्तर दिया, 'जो इसे गोद में लेगा और इसकी पाँच अंगुलियों वाली दो अतिरिक्त भुजाएँ पाँच सिर वाले दो सर्पों के समान पृथ्वी पर गिर पड़ेंगी और जिसे देखकर इस बालक के मस्तक पर स्थित तीसरा नेत्र भी ललाट में समा जाएगा, वही इसकी मृत्यु का कारण होगा।' ॥9-10 1/2॥
 
Then the same invisible ghost again replied, 'The one who will take him in his lap and his two extra arms with five fingers like two serpents with five heads will fall on the earth and on seeing whom the third eye on the forehead of this child will also get absorbed in the forehead, he will be the cause of his death.' ॥ 9-10 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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