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mahabharat 2.5.65: हे शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजन! आप शत्रुओं के राज्य में फसल की कटाई या अकाल की भी उपेक्षा नहीं करते, अपितु युद्धभूमि में शत्रुओं का संहार करते हैं न?॥ 65॥   |   mahabharat अध्याय 2.5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.5.65 
कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परंतप।
अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजन! आप शत्रुओं के राज्य में फसल की कटाई या अकाल की भी उपेक्षा नहीं करते, अपितु युद्धभूमि में शत्रुओं का संहार करते हैं न?॥ 65॥
 
O King, who torments the enemies! You do not ignore the harvesting of crops or the famine in the kingdom of the enemies but instead kill the enemies on the battlefield, don't you?॥ 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)