श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.5.58 
कच्चिद् व्यसनिनं शत्रुं निशम्य भरतर्षभ।
अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी रत्न! जब तुम अपने शत्रु को दुराचार (स्त्री, जुआ आदि) में फंसा हुआ सुनते हो, तब क्या तुम उसके त्रिविध बल (मंत्र, कोष और दास बल अथवा देव बल, मंत्र बल और उत्साह बल) का विचार करते हो - और यदि वह दुर्बल हो, तो क्या तुम उस पर बड़े बल से आक्रमण करते हो?॥ 58॥
 
O jewel of the Bharata clan! On hearing that your enemy is trapped in vices (women, gambling etc.), do you consider his threefold power (mantra, treasury and servant power or God's power, mantra power and enthusiasm power) - and if he is weak, then do you attack him with great force?॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)