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mahabharat 2.5.39: हे शत्रुसूदन! आप शत्रुओं से अनभिज्ञ रहते हैं, सदैव सतर्क और सदैव प्रयत्नशील रहते हैं तथा अपने समस्त शत्रुओं की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हैं, है न?॥ 39॥   |   mahabharat अध्याय 2.5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  2.5.39 
कच्चिद् द्विषामविदित: प्रतिपन्नश्च सर्वदा।
नित्ययुक्तो रिपून् सर्वान् वीक्षसे रिपुसूदन॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुसूदन! आप शत्रुओं से अनभिज्ञ रहते हैं, सदैव सतर्क और सदैव प्रयत्नशील रहते हैं तथा अपने समस्त शत्रुओं की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हैं, है न?॥ 39॥
 
O Shatrusudan! You remain unaware of the enemies, always alert and always diligent, and keep an eye on the activities of all your enemies, don't you?॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)