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नारद उवाच
एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे।
स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम्॥ १२९॥
अनुवाद
नारदजी बोले: जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों (तथा वर्णाश्रम धर्म) की रक्षा में लगा रहता है, वह इस लोक में सुखपूर्वक रहकर अन्त में देवराज इन्द्र के लोक में जाता है।
Narada said: A king who thus remains engaged in the protection of the four Varnas (and the Varnashrama Dharma) after living very happily in this world, finally goes to the world of Devaraj Indra.
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रश्नमुखेन राजधर्मानुशासने पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें नारदजीके द्वारा प्रश्नके व्याजसे राजधर्मका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥