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mahabharat 2.5.125: हे धर्म के ज्ञाता! क्या आप अंधे, गूंगे, अपंग, अंगहीन, अनाथ और पिता के समान स्वजनों से विहीन तपस्वियों का पालन करते हैं?॥125॥   |   mahabharat अध्याय 2.5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.5.125 
कच्चिदन्धांश्च मूकांश्च पङ्गून् व्यङ्गानबान्धवान्।
पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म के ज्ञाता! क्या आप अंधे, गूंगे, अपंग, अंगहीन, अनाथ और पिता के समान स्वजनों से विहीन तपस्वियों का पालन करते हैं?॥125॥
 
O knower of Dharma! Do you take care of the blind, the dumb, the crippled, the limbless, the orphans and the ascetics who are bereft of relatives like a father?॥125॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)