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mahabharat 2.5.100: तुम अपने मन को वश में करके एकाग्र होकर वाजपेय, पुण्डरीक आदि सभी यज्ञों को पूर्णतः करने का प्रयत्न करते हो न?   |   mahabharat अध्याय 2.5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 5: नारदजीका युधिष्ठिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठिरको शिक्षा देना  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.5.100 
कच्चित् क्रतूनेकचित्तो वाजपेयांश्च सर्वश:।
पुण्डरीकांश्च कात्‍स्‍न्‍‍‍र्ये न यतसे कर्तुमात्मवान्॥ १००॥
 
 
अनुवाद
तुम अपने मन को वश में करके एकाग्र होकर वाजपेय, पुण्डरीक आदि सभी यज्ञों को पूर्णतः करने का प्रयत्न करते हो न?
 
You try to control your mind and concentrate and perform all the yagyas like Vajpayee, Pundarika etc. completely, don't you? 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)