श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 47: सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  2.47.4-5h 
मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम्॥ ४॥
अर्च्यमर्चितमर्घार्हमनुजानन्तु ते नृपा:।
 
 
अनुवाद
'वे बुद्धिमान राजा मेरे द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय और परम पूजनीय के रूप में की गई पूजा का हृदय से अनुमोदन करें।' 4 1/2॥
 
'Let those wise kings heartily approve of the worship done by me of Lord Shri Krishna as the Acharya, the father, the guru, the worshipable and the most worthy of worship.' 4 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)