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श्लोक  2.46.d71 
एष भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशा:॥
द्वारकामात्मसात् कृत्वा सागरं गमयिष्यति।
 
 
अनुवाद
ये श्रीकृष्ण के महामुनि कामनाओं और सुखों से परिपूर्ण रमणीय द्वारकापुरी को आत्मसात करके उसे सागर में मिला देंगे।
 
These great sages of Shri Krishna will assimilate the delightful Dwarkapuri, full of desires and pleasures, and will merge it into the ocean.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)