| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश » श्लोक d9-d10 |
|
| | | | श्लोक 2.45.d9-d10  | दक्षिणस्यां लतावेष्ट: पञ्चवर्णो विराजते।
इन्द्रकेतुप्रतीकाश: पश्चिमां दिशमाश्रित:॥
सुकक्षो राजत: शैलश्चित्रपुष्पमहावन:।
उत्तरस्यां दिशि तथा वेणुमन्तो विराजते॥
मन्दराद्रिप्रतीकाश: पाण्डर: पाण्डवर्षभ। | | | | | | अनुवाद | | पुरी के दक्षिण भाग में लतावेष्ट नामक पर्वत शोभायमान था, जो पाँच रंगों वाला होने के कारण इन्द्र के ध्वज के समान जान पड़ता था। पश्चिम में सुकक्ष नामक चाँदी का पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पों से सुशोभित विशाल वन शोभायमान था। हे पाण्डवश्रेष्ठ! इसी प्रकार उत्तर दिशा में वेणुमन्त पर्वत था, जो मन्दराचल पर्वत के समान श्वेत वर्ण का था। | | | | In the southern part of Puri, a mountain called Latavesht was looking beautiful, which looked like Indra's flag because it was of five colours. In the west, there was a silver mountain called Sukaksha, on top of which a huge forest decorated with strange flowers was looking beautiful. O best of the Pandavas! Similarly, in the north, the Venumant mountain, which was white in colour like Mandara mountain, was looking beautiful. | | ✨ ai-generated | | |
|
|