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mahabharat 2.45.d8: विशाल रैवतक पर्वत, जो सुन्दर द्वारका नगरी का अलंकरण था, पूर्व दिशा में शोभायमान था। उसकी चोटियाँ अत्यन्त सुन्दर थीं।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d8 
भाति रैवतक: शैलो रम्यसानुर्महाजिर:।
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां द्वारकायां विभूषणम्॥
 
 
अनुवाद
विशाल रैवतक पर्वत, जो सुन्दर द्वारका नगरी का अलंकरण था, पूर्व दिशा में शोभायमान था। उसकी चोटियाँ अत्यन्त सुन्दर थीं।
 
The huge Raivataka mountain, which was the ornament of the beautiful city of Dwarka, was looking beautiful in the east. Its peaks were very beautiful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)