श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d60-d61
 
 
श्लोक  2.45.d60-d61 
पद्माकुलजलोपेता रक्ता: सौगन्धिकोत्पला:॥
मणिमौक्तिकवालूका: पुष्करिण्य: सरांसि च।
तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमा:॥
 
 
अनुवाद
द्वारका की पुष्करिणी और सरोवर कमल पुष्पों से सुशोभित स्वच्छ जल से भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंग की है। उनमें सुगंधित कमल खिले हुए हैं। उनमें उपस्थित रेत के कण रत्नों और मोतियों के चूर्ण के समान प्रतीत होते हैं। वहाँ लगे विशाल वृक्ष उन सरोवरों के सुंदर तटों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
 
The Pushkarinis and lakes in Dwarka are filled with clean water decorated with lotus flowers. Their aura is red in colour. Fragrant lotuses are blooming in them. The sand particles present in them look like powder of gems and pearls. The big trees planted there enhance the beauty of the beautiful banks of those lakes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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