श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d6-d7
 
 
श्लोक  2.45.d6-d7 
नन्दनप्रतिमैश्चापि मिश्रकप्रतिमैर्वनै:।
भाति चैत्ररथं दिव्यं पितामहवनं यथा॥
वैभ्राजप्रतिमैश्चैव सर्वर्तुकुसुमोत्कटै:।
भाति तारापरिक्षिप्ता द्वारका द्यौरिवाम्बरे॥
 
 
अनुवाद
नंदन और मिश्रक जैसे वन उस नगरी की शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँ का दिव्य चैत्ररथ वन ब्रह्माजी के दिव्य उद्यान के समान शोभायमान था। सभी ऋतुओं के पुष्पों से युक्त वैभ्राज नामक वन के समान सुन्दर उद्यानों से घिरी हुई द्वारकापुरी ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो आकाश में तारों से भरी हुई स्वर्गीय नगरी शोभायमान हो रही हो।
 
Forests like Nandan and Mishrak were enhancing the beauty of that city. The divine Chaitrarath forest there was beautiful like the divine garden of Brahmaji. Surrounded by beautiful gardens like the forest called Vaibhraaj filled with flowers of all seasons, Dwarkapuri looked as if the heavenly city filled with stars in the sky was getting beautiful.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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