श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d58-d59
 
 
श्लोक  2.45.d58-d59 
विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमा:॥
शालतालाश्वकर्णाश्च शतशाखाश्च रोहिणा:।
भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पका:॥
खर्जूरा: केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिता:।
 
 
अनुवाद
भगवान वासुदेव ने भी ब्रह्मलोक से बड़े-बड़े वृक्ष लाकर द्वारका में लगाये हैं। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओं से सुशोभित बरगद, भल्लातक (भिलावा), कपित्थ (कठ), चन्द्र (बड़ी इलायची) के वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा) के वृक्ष - ये वृक्ष वहाँ सर्वत्र लगे हुए थे।
 
Lord Vasudev has also brought big trees from Brahmalok and planted them in Dwarka. Sal, Taal, Ashvakarna (Caner), banyan tree decorated with hundred branches, Bhallataka (Bhilava), Kapittha (Kath), Chandra (big cardamom) trees, Champa, dates and Ketak (Kevda) trees - these trees were planted everywhere there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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