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mahabharat 2.45.d31: विश्वकर्मा द्वारा निर्मित वे (ऊँचे और विशाल) भवन महेंद्र पर्वत की चोटियों के समान शोभायमान हैं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे आकाश में कोई रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चंद्रमा और सूर्य से भी अधिक है।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d31 
महेन्द्रशिखरप्रख्यैर्विहितैर्विश्वकर्मणा।
आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरै:॥
 
 
अनुवाद
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित वे (ऊँचे और विशाल) भवन महेंद्र पर्वत की चोटियों के समान शोभायमान हैं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे आकाश में कोई रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चंद्रमा और सूर्य से भी अधिक है।
 
Those (high and huge) buildings built by Vishwakarma have the beauty of the peaks of Mahendra mountain. Looking at them it seems as if they are drawing a line in the sky. Their light is greater than even the moon and the sun.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)