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श्लोक  2.45.d2 
सोऽपश्यद् वृक्षषण्डांश्च रम्यानारामजान् बहून्।
समन्ततो द्वारवत्यां नानापुष्पफलान्वितान्॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि द्वारकापुरी के चारों ओर उद्यानों में अनेक सुन्दर वृक्ष समूह हैं, जिन पर नाना प्रकार के फल और फूल लगे हुए हैं।
 
He saw that all around Dwarkapuri, there were many beautiful groups of trees in the gardens, which were bearing various kinds of fruits and flowers.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)