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mahabharat 2.45.d12: उस पर्वत के चारों ओर लताओं से आच्छादित मेरुप्रभा नामक महान वन, तालाबों का समूह तथा कमलों से सुशोभित पुष्पकवन शोभायमान हो रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d12 
लतावेष्टं समन्तात् तु मेरुप्रभवनं महत्॥
भाति तालवनं चैव पुष्पकं पुण्डरीकवत्।
 
 
अनुवाद
उस पर्वत के चारों ओर लताओं से आच्छादित मेरुप्रभा नामक महान वन, तालाबों का समूह तथा कमलों से सुशोभित पुष्पकवन शोभायमान हो रहे हैं।
 
Around the mountain covered with creepers, a great forest called Meruprabha, a pond grove and a Pushpakavan (a forest) decorated with lotuses are looking beautiful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)