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mahabharat 2.45.d119: रत्नजटित सैकड़ों ध्वजाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके सिर से मादक रस की धारा बह रही थी, मानो बादल बरस रहे हों।   |   mahabharat अध्याय 2.45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.45.d119 
अनेकशतरत्नाभि: पताकाभिरलङ्कृतम्।
नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम्॥
 
 
अनुवाद
रत्नजटित सैकड़ों ध्वजाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके सिर से मादक रस की धारा बह रही थी, मानो बादल बरस रहे हों।
 
Hundreds of flags decorated with gems were enhancing his beauty. A stream of intoxicant kept flowing from his head as if the clouds were raining.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)