श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d112
 
 
श्लोक  2.45.d112 
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा तत: सर्वानामन्त्र्य कुकुरान्धकान्।
सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं च वासव:॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! कुकुर और अंधक कुल के सब लोगों से ऐसा कहकर देवराज इन्द्र ने उन सबसे विदा लेकर बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेव को हृदय से लगा लिया।
 
Bhishmaji says- Yudhishthira! After saying this to all the people of the Kukura and Andhaka clan, Devraj Indra took leave of them all and embraced Balarama, Shri Krishna and Vasudev.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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