श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d11
 
 
श्लोक  2.45.d11 
चित्रकम्बलवर्णाभं पाञ्चजन्यवनं तथा॥
सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति।
 
 
अनुवाद
रैवतक पर्वत के निकट चित्रकम्बल से रंजित पांचजन्यवन और सर्वतुकवन की भी बड़ी शोभा थी।
 
Near Raivatak mountain, Panchjanyavan and Sarvartukvan, which were colored with Chitrakambal, also had great beauty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)