श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d104
 
 
श्लोक  2.45.d104 
इन्द्र उवाच
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मन:।
यत् कृतं वासुदेवेन तद् वक्ष्यामि समासत:॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र ने कहा- यदुवंशी वीरों! मैं तुम्हें संक्षेप में वह प्रयोजन बताऊँगा जिसके लिए भगवान श्रीकृष्ण ने मानव रूप में अवतार लिया था तथा इस समय भगवान वसुदेव ने जो महान् प्रयास किये थे, वे सब बताऊँगा।
 
Indra said- Yaduvanshi heroes! I will briefly tell you the purpose for which Lord Krishna incarnated in human form and the great efforts made by Lord Vasudev at this time.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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