श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 45: द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  2.45.d1 
भीष्म उवाच
तां पुरीं द्वारकां दृष्ट्वा विभुर्नारायणो हरि:।
हृष्ट: सर्वार्थसम्पन्नां प्रवेष्टुमुपचक्रमे॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! सर्वव्यापी नारायणस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण द्वारकापुरी को सब प्रकार की इच्छित वस्तुओं से परिपूर्ण देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसमें प्रवेश करने के लिए तैयार हुए।
 
Bhishmaji says- Yudhishthir! Lord Shri Krishna, in the form of the omnipresent Narayana, seeing Dwarkapuri filled with all kinds of desired things, happily prepared to enter it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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