श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d99-d101
 
 
श्लोक  2.44.d99-d101 
सपक्षिगणमातङ्गं सव्यालमृगपन्नगम्।
शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम्॥
न्यङ्कुभिश्च वराहैश्च रुरुभिश्च निषेवितम्।
सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसंकुलम्॥
तं महेन्द्रानुज: शौरिश्चकार गरुडोपरि।
पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाटॺ मणिपर्वतम्॥
 
 
अनुवाद
न केवल पर्वत, अपितु उस पर रहने वाले पक्षी, हाथी, सर्प, मृग, सर्प, वानर, पत्थर, चट्टानें, न्यांकु, वराह, रुरु मृग, झरने, बड़े-बड़े शिखर तथा विचित्र मोर आदि, उन सबके साथ मणि पर्वत को भी इन्द्र के छोटे भाई श्रीकृष्ण ने उखाड़कर समस्त प्राणियों के सामने गरुड़ पर रख दिया।
 
Not only the mountain, but also the birds living on it, elephants, snakes, deers, serpents, monkeys, stones, rocks, Nyanku, Varaha, Ruru deer, waterfalls, big peaks and strange peacocks etc., Mani Parvat along with all of them were uprooted by Indra's younger brother Shri Krishna and placed on Garuda in front of all creatures.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas