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श्लोक 2.44.d94  |
यत् प्रियं बत पश्याम वक्त्रं चन्द्रोपमं तु ते।
दर्शनेन कृतार्था: स्मो वयमद्य महात्मन:॥ |
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| अनुवाद |
| इसीलिए आज हम आपके परम प्रिय चन्द्रमा के समान मुख के दर्शन कर रहे हैं। हे परम पुरुष, आपके दर्शन मात्र से ही हमारी तृप्ति हो रही है। |
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| That is why today we are seeing your most beloved moon-like face. We are fulfilled just by seeing you, the Supreme Being. |
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