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mahabharat 2.44.d73: आकाश में चमकने वाले देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा और सूर्य के समान ही, वहाँ आये हुए देवता भी उस पर्वत के प्रकाश से विमुख होकर साधारण प्रतीत हो रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d73
 
 
श्लोक  2.44.d73 
त्रिदशा ऋषयश्चैव चन्द्रादित्यौ यथा दिवि।
प्रभया तस्य शैलस्य निर्विशेषमिवाभवत्॥
 
 
अनुवाद
आकाश में चमकने वाले देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा और सूर्य के समान ही, वहाँ आये हुए देवता भी उस पर्वत के प्रकाश से विमुख होकर साधारण प्रतीत हो रहे थे।
 
Like the gods, sages, moon and sun that shine in the sky, the gods who had come there appeared to be ordinary, repulsed by the light of that mountain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)