श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d70-d71
 
 
श्लोक  2.44.d70-d71 
भीष्म उवाच
देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च।
यानि सन्तीह रत्नानि नरकस्य निवेशने॥
एतत् तु गरुडे सर्वं क्षिप्रमारोप्य वासव:।
दाशार्हपतिना सार्धमुपायान्मणिपर्वतम्॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! नरकासुर के गृह में देवता, गन्धर्व, दानव और राक्षसों से सम्बन्धित जितनी भी मणियाँ उपलब्ध थीं, उन्हें तुरंत गरुड़ पर रख दिया और देवराज इन्द्र दशार्ह वंश के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ मणि पर्वत पर चले गये।
 
Bhishmaji says- Yudhishthir! All the gems related to gods, Gandharvas, demons and demons that were available in the house of Narakasura, immediately placed them on Garuda and Devraj Indra went to Mani Parvat along with Lord Shri Krishna, the ruler of Dasharha dynasty.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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