| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना » श्लोक d64-d66 |
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| | | | श्लोक 2.44.d64-d66  | इन्द्र उवाच
इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च॥
हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिन:।
भीमरूपाश्च मातङ्गा: प्रवालविकृता: कुथा:॥
विमलाभि: पताकाभिर्वासांसि विविधानि च।
ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्य: करेणव:॥ | | | | | | अनुवाद | | इन्द्र बोले- जनार्दन! नाना प्रकार के माणिक्य, रत्न, धन और सुवर्णजाल से सुशोभित विशाल हौदों वाले इन विशाल हाथियों, तोमरों और उन पर बिछाये जाने वाले मूंगों से सुशोभित कम्बलों वाले बलवान हाथियों, स्वच्छ ध्वजाओं से युक्त नाना प्रकार के वस्त्रों आदि पर आपका अधिकार है। इन हाथियों की संख्या बीस हजार है और उससे दुगुनी हथिनियाँ हैं। | | | | Indra said— Janardan! You have the right over these huge elephants with their huge howdahs decorated with various types of rubies, gems, money and gold nets, powerful elephants with their tomaaras and blankets decorated with corals to be spread on them, various types of clothes with clean flags etc. The number of these elephants is twenty thousand and there are twice as many female elephants. | |
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