श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d42-d43
 
 
श्लोक  2.44.d42-d43 
अपारतेजा दुर्धर्ष: सर्वयादवनन्दन:॥
मध्ये लोहितगङ्गायां भगवान् देवकीसुत:।
औदकायां विरूपाक्षं जघान भरतर्षभ॥
पञ्च पञ्चजनान् घोरान् नरकस्य महासुरान्।
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! समस्त यादवों को आनन्द प्रदान करने वाले सर्वशक्तिमान, तेजस्वी एवं वीर भगवान देवकीनन्दन ने औदक के निकट लोहित गंगा के मध्य में विरुपाक्ष तथा नरकासुर के पाँच भयंकर दैत्यों का, जो 'पंचजन' नाम से प्रसिद्ध हैं, वध किया।
 
Bharatshrestha! Lord Devkinandana, the almighty and brilliant and brave Lord, who brought joy to all the Yadavas, killed Virupaksha and the five fierce demons of Narakasura, famously known as 'Panchjana', in the middle of the Lohit Ganga near Audaka.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)