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mahabharat 2.44.d36-d37: ऐसा कहकर भगवान गोविन्द ने बलरामजी से कहा। तत्पश्चात प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा अतुलित पराक्रमी साम्बों से इस विषय में बात करके, महाबली इन्द्रियधीश्वर भगवान श्रीकृष्ण गरुड़ पर आरूढ़ होकर, शंख, चक्र, गदा और तलवार धारण करके देवताओं का कल्याण करने की इच्छा से वहाँ से चले गये।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d36-d37
 
 
श्लोक  2.44.d36-d37 
एवमुक्त्वा तु गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत।
प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले॥
एतांश्चोक्त्वा तदा तत्र वासुदेवो महायशा:।
अथारुह्य सुपर्णं वै शङ्खचक्रगदासिधृक्॥
ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया।
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर भगवान गोविन्द ने बलरामजी से कहा। तत्पश्चात प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा अतुलित पराक्रमी साम्बों से इस विषय में बात करके, महाबली इन्द्रियधीश्वर भगवान श्रीकृष्ण गरुड़ पर आरूढ़ होकर, शंख, चक्र, गदा और तलवार धारण करके देवताओं का कल्याण करने की इच्छा से वहाँ से चले गये।
 
Saying this, Lord Govinda talked to Balramji. Thereafter, after talking about it with Pradyumna, Aniruddha and the incomparably powerful Sambas, the great Lord Indriyadhishwar, Lord Shri Krishna, mounted on Garuda, donning the conch, chakra, mace and sword, left from there with the desire to do good to the gods.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)