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mahabharat 2.44.d18: वह पृथ्वी से देवयान तक का मार्ग रोककर खड़ा रहता था। भयानक रूप वाले दैत्यों के साथ रहकर वह देव समुदाय को भयभीत करता था।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d18
 
 
श्लोक  2.44.d18 
आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिता:।
त्रासना: सुरसङ्घानां विरूपै राक्षसै: सह॥
 
 
अनुवाद
वह पृथ्वी से देवयान तक का मार्ग रोककर खड़ा रहता था। भयानक रूप वाले दैत्यों के साथ रहकर वह देव समुदाय को भयभीत करता था।
 
He used to stand blocking the path from the earth to Devayana. Staying with the terrifying looking demons, he used to frighten the community of gods.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)