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mahabharat 2.44.d104: उड़ते समय गरुड़ पर्वतों की चोटियों को तोड़ देते थे, वृक्षों को उखाड़ देते थे और आकाश में विचरण करते समय बड़े-बड़े बादलों को अपने साथ उड़ा ले जाते थे।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d104
 
 
श्लोक  2.44.d104 
आरुजन् पर्वताग्राणि पादपांश्च समुत्क्षिपन्॥
संजहार महाभ्राणि वैश्वानरपथं गत:।
 
 
अनुवाद
उड़ते समय गरुड़ पर्वतों की चोटियों को तोड़ देते थे, वृक्षों को उखाड़ देते थे और आकाश में विचरण करते समय बड़े-बड़े बादलों को अपने साथ उड़ा ले जाते थे।
 
While flying, Garuda used to break the peaks of mountains, uproot trees and while moving in the sky, he used to take away big clouds with him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)