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mahabharat 2.44.d102-d103: महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम और महाबली इंद्र को, रत्नों और पर्वतों के उस अतुलनीय ढेर को, वरुणदेव के दिव्य अमृत को और चंद्रमा के समान तेजस्वी शुभ छत्र को लेकर चलने लगे। उनका शरीर विशाल पर्वत शिखर के समान था। वे अपने पंख जोर-जोर से हिलाते हुए चारों ओर गर्जना कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 2.44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 44: नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना  »  श्लोक d102-d103
 
 
श्लोक  2.44.d102-d103 
उपेन्द्रं बलदेवं च वासवं च महाबलम्।
तं च रत्नौघमतुलं पर्वतं च महाबल:॥
वरुणस्यामृतं दिव्यं छत्रं चन्द्रोपमं शुभम्।
स्वपक्षबलविक्षेपैर्महाद्रिशिखरोपम:॥
दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन्।
 
 
अनुवाद
महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम और महाबली इंद्र को, रत्नों और पर्वतों के उस अतुलनीय ढेर को, वरुणदेव के दिव्य अमृत को और चंद्रमा के समान तेजस्वी शुभ छत्र को लेकर चलने लगे। उनका शरीर विशाल पर्वत शिखर के समान था। वे अपने पंख जोर-जोर से हिलाते हुए चारों ओर गर्जना कर रहे थे।
 
The mighty Garuda started walking carrying Shri Krishna, Balram and the mighty Indra, that incomparable pile of gems and mountains, the divine nectar of the god Varuna and the auspicious umbrella as bright as the moon. His body was like a huge mountain peak. He was moving his wings forcefully and making a lot of noise in all directions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)