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mahabharat 2.43.d56: भोजराज के वे पर्वत के समान हाथी विचित्र ध्वजाओं और पताकाओं से सुशोभित रहते थे और सदैव संतुष्ट रहते थे।   |   mahabharat अध्याय 2.43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना  »  श्लोक d56
 
 
श्लोक  2.43.d56 
ते च पर्वतसङ्काशाश्चित्रध्वजपताकिन:॥
बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजा:।
 
 
अनुवाद
भोजराज के वे पर्वत के समान हाथी विचित्र ध्वजाओं और पताकाओं से सुशोभित रहते थे और सदैव संतुष्ट रहते थे।
 
Those mountain-like elephants of Bhojraj were adorned with strange flags and banners and were always satisfied.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)