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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना  »  श्लोक d27
 
 
श्लोक  2.43.d27 
केशिनं नाम दैतेयं राजन् वै हयविग्रहम्।
तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम्॥
प्रहितं भोजपुत्रेण जघान पुरुषोत्तम:।
 
 
अनुवाद
राजन! व्रज में केशी नाम का एक राक्षस रहता था, जिसका शरीर घोड़े के समान था। उसमें दस हज़ार हाथियों का बल था। कुन्तीनन्दन! वह घोड़े के रूप वाला राक्षस भोजकुल में उत्पन्न कंस का भेजा हुआ था। वृंदावन आकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर के समान उसका भी वध कर दिया।
 
Rajan! There lived a demon named Keshi in Vraja, whose body was like a horse. He had the strength of ten thousand elephants. Kuntinandan! That demon in the form of a horse was sent by Kansa, born in Bhojakul. On coming to Vrindavan, Purushottam Shri Krishna killed him also like Arishtasura.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)