श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना  »  श्लोक d14-d15
 
 
श्लोक  2.43.d14-d15 
ह्रदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्धनि॥
कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यत:।
विजहार तत: कृष्णो बलदेवसहायवान्॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन में कदम्ब वन के निकट हृद (तालाब) में प्रवेश करके उन्होंने कालियानाग के मस्तक पर नृत्य किया। फिर सबके सामने उन्होंने कालियानाग को अन्यत्र जाने का आदेश दिया और बलदेवजी के साथ वन में इधर-उधर विचरण करने लगे।
 
Entering the Hrid (pond) near Kadamba forest in Vrindavan, he danced on the head of Kalianag. Then, in front of everyone, he ordered Kalianag to go elsewhere and started wandering here and there in the forest with Baldevji.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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