श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 43: कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  2.43.d1 
भीष्म उवाच
तत: कदाचिद् गोविन्दो ज्येष्ठं सङ्कर्षणं विना।
चचार तद् वनं रम्यं रम्यरूपो वरानन:॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन सुन्दर रूप और सुन्दर मुख वाले भगवान गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षण को साथ न लेकर सुन्दर वृन्दावन में चले गये और इधर-उधर विचरण करने लगे।
 
Bhishmaji says- Yudhishthir! Subsequently, one day Lord Govind, who had a beautiful appearance and a beautiful face, went to the beautiful Vrindavan without taking his elder brother Sankarshan along with him and started wandering here and there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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