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श्लोक 2.42.d36  |
क्वचिद् वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद् वने।
पर्णशय्यासु संसुप्तौ क्वचिन्निद्रान्तरैषिणौ॥ |
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| अनुवाद |
| दोनों भाई कहीं रुककर जंगल में एक-दूसरे के साथ खेलते और कहीं पत्तों का बिस्तर बिछाकर सो जाते। |
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| Both the brothers would stop somewhere, play with each other in the forest and somewhere they would spread a bed of leaves and sleep. |
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