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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 42: श्रीकृष्णका प्राकटॺ तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन  »  श्लोक d25
 
 
श्लोक  2.42.d25 
अन्योन्यकिरणग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे॥
विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा।
 
 
अनुवाद
जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक-दूसरे की किरणों से बँधे हुए आकाश में साथ-साथ विचरण करते हैं, वैसे ही बलराम और श्रीकृष्ण भी सर्वत्र साथ-साथ विचरण करते थे। उनकी भुजाएँ सर्प के शरीर के समान सुशोभित थीं।
 
Just as the Moon and the Sun move together in the sky bound by each other's rays, similarly Balram and Shri Krishna moved together everywhere. His arms were decorated like the body of a snake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)