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श्री महाभारत
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पर्व 2: सभा पर्व
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अध्याय 42: श्रीकृष्णका प्राकटॺ तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन
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श्लोक d1
श्लोक
2.42.d1
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तोऽथ कौन्तेयस्तत: पौरवनन्दन:।
आबभाषे पुनर्भीष्मं धर्मराजो युधिष्ठिर:॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीष्म के ऐसा कहने पर पुरुवंश को सुखी करने वाले कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे पुनः कहा।
Vaishmpayana says - Janamejaya! When Bhishma said this, Kunti's son Dharmaraja Yudhishthira, who makes the Puru dynasty happy, said to him again.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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