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mahabharat 2.40.d7: धर्म और सत्य ही उनका स्वरूप थे, वे अलौकिक तेज से संपन्न थे। वे विक्रम के रूप में विविध कर्मों से सुशोभित थे, प्रायश्चित उनके नख थे, वे धैर्यवान स्वभाव के थे, पशु उनके घुटनों के स्थान पर थे और महान वृषभ (धर्म) उनका स्वरूप था।   |   mahabharat अध्याय 2.40: वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.40.d7 
धर्मसत्यमय: श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृत:॥
प्रायश्चित्तनखो धीर: पशुजानुर्महावृष:।
 
 
अनुवाद
धर्म और सत्य ही उनका स्वरूप थे, वे अलौकिक तेज से संपन्न थे। वे विक्रम के रूप में विविध कर्मों से सुशोभित थे, प्रायश्चित उनके नख थे, वे धैर्यवान स्वभाव के थे, पशु उनके घुटनों के स्थान पर थे और महान वृषभ (धर्म) उनका स्वरूप था।
 
Dharma and truth were his form, he was blessed with supernatural brilliance. He was adorned with various deeds in the form of Vikram, atonement was his nails, he was endowed with a patient nature, animals were in place of his knees and the great bull (Dharma) was his form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)