| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 40: वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा » श्लोक d48-d50 |
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| | | | श्लोक 2.40.d48-d50  | तेषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप स:।
इज्यश्चासीन्मखवरै: स तैर्देवर्षिसत्तमै:॥
नरकस्थान् समानीय स्वर्गस्थांस्तांश्चकार स:।
एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली॥
आश्रमेषु महाभागान् मुनीन् वै संशितव्रतान्।
सत्यधर्मपरान् दान्तान् पुरा धर्षितवांश्च स:॥ | | | | | | अनुवाद | | उनका स्थान लेकर वह स्वयं उन सबका कार्य देखने लगा। श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा महर्षियों द्वारा पूजित देवताओं के स्थान पर वह स्वयं यज्ञ के भाग का अधिकारी बन गया। उसने समस्त प्राणियों को नरक से निकालकर स्वर्ग का वासी बना दिया। यह सब कार्य करने के पश्चात् उस शक्तिशाली दैत्यराज ने ऋषियों के आश्रमों पर आक्रमण कर दिया और सत्य एवं धर्म में तत्पर, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले तथा कठोर व्रतों का पालन करने वाले महर्षियों को कष्ट देना आरम्भ कर दिया। | | | | Taking their place, he himself started looking after the work of all of them. Instead of the gods who were worshipped by the great sages through the best yagnas, he himself became entitled to the share of the yagna. He took out all the living beings from hell and made them residents of heaven. After doing all these works, the powerful demon king attacked the ashrams of the sages and started harassing the great sages who were devoted to truth and religion and controlled their senses and who were following strict vows. | |
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