| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 40: वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा » श्लोक d131-d133 |
|
| | | | श्लोक 2.40.d131-d133  | पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् यजेयं विपुलैर्मखै:।
अमित्रान् निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे॥
दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयो वर एष मे।
यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृश: पुमान्॥
इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘मैं देवताओं, ऋषियों, पितरों और ब्राह्मण अतिथियों के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ करूँ तथा युद्धस्थल में अपने शत्रुओं को तीखे बाणों से मारकर यमलोक भेज दूँ।’ हे दत्तात्रेय! यह मेरा तीसरा वर हो। ‘जिसके समान इस लोक और स्वर्ग में न कोई मनुष्य था, न है, वही मेरा वध करे।’ (यह मेरा चौथा वर हो)। | | | | ‘I should perform many types of sacrifices for the gods, sages, ancestors and Brahmin guests and kill my enemies in the battlefield with sharp arrows and send them to Yamaloka.’ O Lord Dattatreya! Let this be my third boon. ‘The one like whom there was no man in this world or heaven, nor is there any, should be the one to kill me.’ (Let this be my fourth boon). | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|