यदि शिशुपाल इस पूजा को अनुचित समझता है, तो अब वह उस अनुचित पूजा के संबंध में जो उचित समझे, वह करे ॥33॥
If Sisupala considers this worship to be improper, he may now do whatever he deems appropriate regarding that improper worship. ॥ 33॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशोऽध्याय:॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें भीष्मवाक्य नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)